मैंने देखे आते-जाते, हज़ारों टन के भारी बोझ
भारतीय रेल के लोकोमोटिव, जिनको खींच रहे हैं रोज
इतना बोझ बंधा है पीछे, कि धरती दहले, सिहरे, काँपे
मशीन की जीवटता तोले, ट्रैकटिव इफर्ट की सीमा नापे
हर हाल खींच लेनें को आतुर,लोको इतना जोर लगाये
मानों सोचे बैठा हो कि प्राण जायें पर वचन ना जाये
कहीं ग्रेडिअंट ऊँचा- नीचा,कहीं ट्रैक पर तीक्ष्ण मोड
कईं बार तो लगे ऐसा कि हिम्मत साथ रही हो छोड़
आवाजें ऐसी आती हैं, घूँ- घूँ और साँय-साँय
गीला हो ट्रैक तो फिर देखो रेलों,चक्कों की चाँय- चाँय
लोकोमोटिव कैब के अंदर रहता कोई मनुज भी है
जद्दोजहद इस खींचतान को सहता कोई मनुज भी है
दिखता है बिल्कुल एक चित्त, कुछ भी कर जानें को तत्पर
रखता हर पेरामीटर पर गिद्ध दृष्टि, पैनी नजर
क्या बेजोड़ जुगलबंदी, एक मानव और एक मशीन
बाजी हाथ से गई हुई भी, दोनों मिलकर लेंगे छीन
इक दूजे के पूरक हैं ये, जब दोनों एक सुर में बोलेंगे
पथ में लाख रुकावट हों, निश्चित राह नई खोलेंगे ।
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