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अब लहरें कश्ती को रोक नहीं पाएँगी।

                
                                                         
                            दूर तलक निगाहें देख नहीं पाएँगी,
                                                                 
                            
अब लहरें कश्ती को रोक नहीं पाएँगी।

मैं बोल भी दूँ खिलाफ उसके तो क्या,
ये साज़िशें दोस्ती तोड़ नहीं पाएँगी।

हर मोड़ पर एक दुश्मन खड़ा है मेरा,
खूब है ऐसी दुश्मनी, और नहीं पाएगी।

पहली बार ललकारा है मैंने उसको,
शायद उसकी ज़ुबाँ अब बोल नहीं पाएगी।
~ संजीव जारेवाल
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2 घंटे पहले

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