आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गजल

Gajal
                
                                                         
                            जख्म खाता रहा
                                                                 
                            
दिल लगाता रहा....

1.  कहीं वो हमसे हमारे ख्यालों में मिल जाये
    बस अपनी ही गजल के शेर गुनगुनाता रहा ...

2.  मालूम हमें था, उनकी जिन्दगी तो कोई और है
   फिर भी अपनी जिन्दगी उन्ही पर लुटाता रहा...

3.  जरा ये सोच कि गुजरती होगी उस गुलाब पर क्या
   जो खुद टूटकर दो दिलो को मिलाता रहा....

4. जिसने लूट ली हमारी सांसे, हसरते, दिल ,दुनिया
  मैं उसे अपने दिल का मालिक बताता रहा....

5. दोस्तों की दगाबाजियों से जब हम डरने लगे
  दुश्मन को साथ लेकर किस्से सुनाता रहा....

6. कोई तो ले लेगा शायद टूटा हुआ दिल
  वेबफाओं की बस्ती में दिल का बाजार लगाता रहा...

7. शायद कोई तो आकर रंग भर देगी "ऐ मुशाफिर"
 उम्मीद लिए बेरंग तस्वीरें बनाता रहा .........

              *जख्म खाता रहा .........
                दिल लगाता रहा.........
 
 
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर