यह गरमी इतनी बढ़ी, मिले कहीं ना चैन ।
जीना अब दूभर हुआ, दिन हो या कि रैन ।
चलो नहा लें थोड़ा हम भी, सरिता के ठण्डे जल में।
मिल जाए गरमी से राहत, कूदें आओ जल में।
कहीं निकल न जाए प्राण, गरमी से इक पल में।
इस गरमी में आओ हम, इस नदियां में खूब नहाएँ।
करें ठिठोली मिलजुल करके, भीषण गरमी दूर भगाएँ।
तपता सूरज, तपती धरती, चलती गरम हवाएँ।
यह गरमी इतनी बढ़ी, अब चैन कहीं ना पाएँ।।
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