आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

भले यहां हम मर जाएंगे ।

                
                                                         
                            चलें सदा हम सत्य मार्ग पर,
                                                                 
                            
रहें असत् से कोसों दूर ।
दया भाव हो दिल में अपने,
भरी उमंगें हो भरपूर ।।
मन हो सदा ही निश्छल अपना,
अंतःस्थल में कभी कपट ना।
दिन दुखी की सेवा करना,
मानवता ही धर्म हो अपना ।।
परहित का ही भाव हो दिल में,
मद आलस का अभाव हो तन में।
भारत मां की सेवा का,
बीज बोएं हम जन-जन में ।।
वाणी से रस बरसे अपने,
करता विनती रब से ।
हम अबोध की सुधि लो,
हे प्रभु ! पड़ा द्वार कब से ।।
हे अखिलेश्वर! हे परमपिता !
दरस दिखाओ मुझको।
हम अबोध अज्ञानी ठहरे,
शीश झुकाते तुझको ।।
दरस दिये जो अब ना तू तो,
हम कुछ भी कर जाएंगे ।
छोड़ेंगे ना द्वार तुम्हारा,
भले यहां हम मर जाएंगे ।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
45 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर