चलें सदा हम सत्य मार्ग पर,
रहें असत् से कोसों दूर ।
दया भाव हो दिल में अपने,
भरी उमंगें हो भरपूर ।।
मन हो सदा ही निश्छल अपना,
अंतःस्थल में कभी कपट ना।
दिन दुखी की सेवा करना,
मानवता ही धर्म हो अपना ।।
परहित का ही भाव हो दिल में,
मद आलस का अभाव हो तन में।
भारत मां की सेवा का,
बीज बोएं हम जन-जन में ।।
वाणी से रस बरसे अपने,
करता विनती रब से ।
हम अबोध की सुधि लो,
हे प्रभु ! पड़ा द्वार कब से ।।
हे अखिलेश्वर! हे परमपिता !
दरस दिखाओ मुझको।
हम अबोध अज्ञानी ठहरे,
शीश झुकाते तुझको ।।
दरस दिये जो अब ना तू तो,
हम कुछ भी कर जाएंगे ।
छोड़ेंगे ना द्वार तुम्हारा,
भले यहां हम मर जाएंगे ।।
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