आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

देखो सबके बदन कंपाई।।

                
                                                         
                            ठण्डक आई, ठण्डक आई
                                                                 
                            
देखो सबके बदन कंपाई
दिनकर खेले लुका-छिपाई
कुछ भी देता नहीं दिखाई
कोहरे ने की बहुत ढिठाई
कम पड़ने हैं लगे रजाई
मुन्नू का सीना जकड़ा है
चुन्नू को सर्दी पकड़ा है
बुढ़ऊ देखो कैसे सिकुड़े
गर्म ना कोई कपड़ा है
पशु-पक्षी सब व्याकुल हैं
गर्मी पाने को आकुल हैं
बुढ़िया ने है आग जलाई
बच्चे करते तपा-तपाई
प्यारे बच्चों बचकर रहना
मनमानी तुम कभी ना करना
देखो पूरे तन तुम ढकना
बाँधो मफलर, ओढ़ो साल
साथ में रखना शाल+दुशाल
ठण्डक ने ली है अंगड़ाई
बचकर करना लिखा-पढ़ाई
देखो सबके बदन कंपाई।
ठण्डक आई, ठण्डक आई
देखो सबके बदन कंपाई।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
42 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर