आसमान से धीरे-धीरे,
उतरा उड़न खटोला ।
फिर किसी ने हौले से,
दरवाजे को खोला ।।
एक परी बिलकुल गुड़िया सी,
एक हाथ में लिए छड़ी ।
मधुर मुस्कान लिए अधरों पर,
श्वेत वस्त्र में दिखी खड़ी।।
उतरी उड़न खटोले से वह,
आई सोते बालक के पास ।
फेरा हाथ उसके सर पर,
छड़ी घुमाई उसके पास ।।
तभी डूब जाता सपनों में,
मंद-मंद मुस्काता वह ।
उड़ता जाता गगन के पार,
रहती अगड़ित परियां जंह ।।
एक परी ने उसे उठाया,
स्वर्ण सिंहासन पर बैठाया ।
चांदी के चम्मच से उसने,
उसे प्यार से खीर खिलाया ।।
एक दूजे ने छड़ी हिलाई,
उसके कपड़े नये बनाई ।
जूते, मोजे, टोपी, स्वेटर,
झट से उसने उसे मंगाई ।।
उन्हें पहन वह राजकुमार सा,
लगा भाग्य पर इठलाने ।
कुछ परियों ने नाच दिखाया
कुछ ने गाए नए तराने ।।
फिर वह पहुँचा इंद्रसभा में,
एक सुंदर सी परी के संग ।
छीन लिया इंद्रासन को वह,
सभी देवता रह गए दंग ।।
ब्रह्मा, विष्णु, शिव सभी ने,
हाथ जोड़ उसे किया प्रणाम।
लक्ष्मी, काली और सती ने,
गाया उसका खूब गुणगान ।।
पुनः हिलाया छड़ी परी ने,
दोनों आए धरती पर ।
बोली मम्मी “चल बिस्तर पर”,
यहीं सो गया तू पढ़कर ।।
नींद खुली, फिर पाया उसने,
खुद को पड़ा हुआ छत पर ।
स्वप्न बेचारा लौट चुका था,
हो निराश, कल्पित पथ पर।।
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