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हमीं हिमालय, हमीं हैं सागर,

                
                                                         
                            हम अबोध हैं, बच्चे हैं, क्यों
                                                                 
                            
हमें सताये ये जाड़ा ?
हम कोमल हैं, कच्चे हैं,
क्यों हमें कंपाये ये जाड़ा ?
थोड़े चंचल हैं पर सच्चे हैं,
क्यों हमें डराये ये जाड़ा ?
करें शरारत, पर अच्छे हैं,
क्यों हमें रुलाये ये जाड़ा ?

हमीं कृष्ण हैं, हमीं हैं राम,
क्यों हमें रिझाये ये जाड़ा ?
हमीं लखन हैं, हमीं बलराम
क्यों हमें खिझाये ये जाड़ा ?
हमीं दुर्वासा हैं, हमीं परशुराम
क्यों हमें चिढ़ाये ये जाड़ा ?
हमीं तीर्थ और हमीं हैं धाम,
क्यों हमें मिटाये ये जाड़ा ?

हम अडिग और हम निडर हैं,
क्यों हमें बहकाये ये जाड़ा?
हमीं अग्नि और हमीं हैं
दिनकर, क्यों हमें जमाये ये जाड़ा?
हमीं पुष्प और हमीं हैं उपवन,
क्यों न हमें महकाये ये जाड़ा ?
हमीं धरा हैं, हमीं गगन, क्यों
बल आजमाये ये जाड़ा ?

हमीं हिमालय, हमीं हैं सागर,
क्यों हमें नहलाये ये जाड़ा ?
हमीं देव और हमीं निशाचर,
क्यों हमें बहलाये ये जाड़ा ?
हमीं हैं पंडित, हमीं निरक्षर,

क्यों हमें भरमाये ये जाड़ा ?
हमीं धुन और हमीं हैं अक्षर,
क्यों हमें भुलाये ये जाड़ा ?
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2 घंटे पहले

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