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‎समृद्ध भारत

                
                                                         
                            ‎समृद्ध भारत
                                                                 
                            
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‎यद्यपि हम समृद्ध देश के, वासी हैं कहलाते,
‎मृदुल स्वच्छ जल से अपने, पशुओं को नहलाते
‎टी.बी., मोबाइल, लैपटॉप से, मन को हैं बहलाते
‎पालतू कुत्ते, बिल्ली को, बड़े प्रेम से सहलाते
‎झूठी शान के चलते हम, पैसा खूब लुटाते
‎भोग विलास की वस्तुएँ, दिन-प्रतिदिन जुटाते
‎अच्छा होता इन पैसों से, भूखों की भूख मिटाते
‎दीन-हीन जों; उनको हम, अपने गले लगाते ।।
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‎पर, क्या ऐसा करते हैं ? भूलें को पथ बतलाते ?
‎किसी गरीब की कुटिया में, दीपक कभी जलाते ?
‎क्या नैराश्य-निमग्न जनों को, अपने गले लगाते ?
‎गिरे हुए कभी किसी मनुज को, दौड़ तुरत उठाते ?
‎यदि नहीं, तो कैसे मानव हम ? कैसी हैं समृद्धि ?
‎यह आसुरी प्रवृत्ति मेरे भाई ! करो न इसकी वृद्धि,
‎संस्कृति, सभ्यता, धर्म, ईमान, इनका रखना ध्यान
‎तभी होगी सच्ची समृद्धि, बनेगा अपना देश महान।।
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‎है भूखमरी, गरीबी जब तक, किसी देश में प्यारे
‎हर उपलब्धि, हर दावे बंधु ! धूमिल लगते सारे
अगड़ित जन हैं भूखे सोते, रहते कितने नंगे
धनवानों की नजर में वे हैं, लुच्चे और लफंगे।।
‎ - संजय कुमार गुप्त 'अबोध'
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एक घंटा पहले

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