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भारी इतनी गठरी जो थी ।।

                
                                                         
                            पंडित जी ने पहनी धोती,
                                                                 
                            
निकले हाथ लिए पोथी ।
भागे सरपट लाला के घर,
काँप रहे थे वो थर–थर ।
बोले लाला अभी को आये ?
क्यूँ इतनी तुम देर लगाये ?
पंडित जी ने तोंद दिखाया,
बोले–“आज ठूंसकर खाया।”
अक्षत, दही, सिंदूर मंगाया,
दूब, पान और घी भी आया ।
पंडित जी ने रसम निभाया,
जल्दी-जल्दी कथा सुनाया ।
सुना कथा फिर शंख बजाया,
ठाकुरजी को घी से नहलाया ।
लिए दक्षिणा, बाँधे गठरी,
खुद से बोले–“चल उठ री ।।”
खाये जम कर दही-चुड़ा,
भागे फिर वो पिंड छुड़ा ।
सोचे– ‘जाना शर्मा के घर ’
खाना वहाँ भी जी भर कर।।
पेट कर रहा था चर-चर,
भागे पंडित जी सर-सर।
भूल गए थे अपना पोथी,
भारी इतनी गठरी जो थी ।।
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54 मिनट पहले

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