पापा मंदिर क्यों जाते हो?
मंदिर में भगवान नहीं।
जन-जन को जो जीवन देता,
वह तो रहता और कहीं।।
सोचो! यदि रहता भगवान,
पत्थर के इस मंदिर में ।
शिव-शंकर क्यों डूबे रहते,
अपने ही मन-मंदिर में ?
ढूँढते तब तो सभी देवता,
मंदिर में उस ईश्वर को ।
क्या देखा है कभी किसी ने,
मंदिर में जगदीश्वर को ?
निरा कल्पना या फिर ढोंग,
मंदिर-मस्जिद सारे हैं।
स्वार्थ-सिद्धि बस कुछ लोगों ने,
यह सब जाल पसारे हैं।।
बंद न कमरे में रह पाता,
जब मानव कल परसों तक।
फिर मंदिर में कैसे रहता,
जग-उद्धारक वर्षों तक ?
हम अबोध हैं, बुद्धू हैं,
जो उसे ढूँढते मंदिर में।
वह है जग के कण-कण में,
हर ‘मानव-मन-मंदिर’ में।।
मंदिर जाना छोड़ो पापा !
चलो चलें दुखियों के द्वार ।
ईश्वर निश्चित वहाँ मिलेगा,
हो जाएगी नैया पार ।।
उनको रोटी कपड़ा देंगे,
देंगे सारा प्यार-दुलार ।
कितने ही आशीष मिलेंगे,
होगा अपना भी उद्धार ।।
सच्ची पूजा जन की सेवा,
जन ही हैं, नारायण-रूप ।
जन के अंदर खोजो पापा!
दिखेगा निश्चित प्रभु-स्वरूप।।
मंदिर क्यों जाते हो पापा?
मंदिर में भगवान नहीं।
जन-जन को जो जीवन देता,
वह तो रहता और कहीं ।।
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