दिन भर सिकुड़े - सिकुड़े रहते, ठण्ड पड़ेगा कितना
इस ठण्डक ने देह कंपाया, करें सुरक्षा कितना ?
जितने फटे-पुराने कपड़े, सारे लादे तन पर
फिर भी असर छोड़ ही देता, ठण्ड पवन मेरे मन पर ।
सर्दी का प्रकोप बढ़ा है, पर दिन पर दिन चढ़ा है
सारा ऊनी वस्त्र कढ़ा है, इतनी सर्दी कभी पड़ा है?
अब तो जान बचाए आग, ठण्डक दूर भगाये आग
लोगों को गरमाए आग, कभी नहीं शरमाए आग ।।
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