आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

लोगों को गरमाए आग, कभी नहीं शरमाए आग ।

                
                                                         
                            दिन भर सिकुड़े - सिकुड़े रहते, ठण्ड पड़ेगा कितना
                                                                 
                            
इस ठण्डक ने देह कंपाया, करें सुरक्षा कितना ?
जितने फटे-पुराने कपड़े, सारे लादे तन पर
फिर भी असर छोड़ ही देता, ठण्ड पवन मेरे मन पर ।

सर्दी का प्रकोप बढ़ा है, पर दिन पर दिन चढ़ा है
सारा ऊनी वस्त्र कढ़ा है, इतनी सर्दी कभी पड़ा है?
अब तो जान बचाए आग, ठण्डक दूर भगाये आग
लोगों को गरमाए आग, कभी नहीं शरमाए आग ।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
42 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर