धरती माता हमें बताओ,
इतना बोझ उठाती कैसे,
जुल्म अगर होता तुझपर तो
अपना दर्द छुपाती कैसे ?
तोड़-फोड़ जब मानव करते,
दिल अपना सहलाती कैसे,
बहती खून की नदियां जब,
अपना मन बहलाती कैसे ?
काट दिया नर ने जंगल को,
छिन्न तेरा परिधान किया ।
हम बहके मानव को फिर भी,
हँसकर गले लगती कैसे ?
यत्र-तत्र कूड़ा फैलाते,
नदियों में गंदगी बहाते,
छलनी करते रोज तुम्हें जो,
आँचल में उन्हें सुलाती कैसे ?
बहुत विशाल हृदय है तेरा,
तुम्ही हो सबकी माता ।
धरणी-भरणी, जगपालक हो,
रखे सलामत तुझे विधाता।।
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