आधुनिकता ने खींच दी
ये कैसी लकीर है
मारकर जमीर अपने को
कहता फकीर है
संभव है अनपढ़ होना
पढ़कर पढ़ाकर भी
जुड़ना न सीख पाए
फँसकर फँसाकर भी
-कुँवर
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