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बाबा की याद में

                
                                                         
                            अब विलीन हुए शून्य में वो,
                                                                 
                            
मेरे सबसे मजबूत पक्षधर थे जो।
मेरी हां में उनकी हां हो जाती थी,
मेरी न हो जिसमें वो उनको भी न भाती थी।
मेरे पहले मित्र थे वो, मैं शायद उनका अंतिम था,
इसी लिए हम दोनों का रिश्ता भी सबसे प्रीतम था।
जब-जब मैं बीमार हुआ वो लिए फिरे थे कंधों पर,
जिसने जहां बताया था, वो लिए फिरे दर-दर पर।
उस समय वो अपना फर्ज निभा गए,
जो इस समय मैं नहीं निभा पाया।
उनके किए कर्म का ऋण मैं रत्ती भर न भर पाया,
उनके प्रति मैं कुछ भी न कर पाया।
इस शर्मिंदगी को लेकर मैं जब-जब उनको सोचूँगा,
धिक्कारेगी आत्मा मेरी मैं कैसे उसको परितोषूँगा।
भले शिकायत करे ये कुनबा भौतिक साधन कम छोड़े,
आध्यात्मिक ताकत दी इतनी हर विपदा का हम दम तोड़े।त्रिताप था उनको कंधा देना, मैं खेला जिनके कंधे पर,
व्याकुल हो जाते थे वो, थोड़ा लंगड़ा कर भी मैं चलता,
मेरा दुर्भाग्य यह था, मैं देख रहा था उनको जलता।
एक टक देख रहा था उनको मेरा न कोई बस चल रहा था,
उनकी जलती चिता में मेरा भी एक हिस्सा जल रहा था।लौट आया भारी मन से, बाकी सब कुनबा साथ में है,
उनको कैसे भूलूंगा, जिनको छोड़ा गंगा घाट में है।
वैसे तो मेरी कई पीढ़ियां इस रेत के कण में शामिल हैं,
लेकिन बाबा के जाने से अब आगे का जीवन बेहद मुश्किल है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
49 मिनट पहले

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