सारे गहने उन सबके ही
अपना तो बस नूर
जिंदा रखो स्वप्निल खयाली
मत होने दो उसे दूर
लहर उठेगी चमक दिखेगी
सरिता होगी ही पार
नाव को चलने दो धारा में
मत छोड़ो पतवार
-कुँवर संदीप सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X