प्रेमी दिवस पर काला दिवस, मना रहे हैं हम
देखता जा कैसे अपनी कला, दिखा रहे हैं हम
धूर्त है मक्कार है, तू लगाता है घात
सोचता है आकर, तुझसे करूं मैं बात
बात होगी नहीं, अब लात खाएगा तू
समझ असलियत को, तभी पाएगा तू
अमन चैन और सद्भाव के, वसूल हैं अपने
तू समझ जा और सुधार ले, भूल को अपने
वरना पाताल तक, फिसल के जायेगा तू
फिर कभी वहां से न, निकल पाएगा तू
-संदीप सिंह कुंवर
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