खुदा तेरी खुदाई क्या रंग लाती है
बचाती डूबते को बचते को डुबाती है
जख्मी शख्सियत को तू संवार देता है
क्या होगा जिन्हें समझ ये नहीं आती है
जंग जीवन की लड़े जो तेरी इबादत से
शिकस्त उसके पास कहां कभी आती है
कमाए क़र्ज़ वो जो भी निभाए फ़र्ज़ नहीं
तेरा हिसाब उससे चुकता सब कराती है
-कुँवर
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