आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जिन्हें चाहते हैं हम

                
                                                         
                            वो चाहते हैं हमको जिन्हें चाहते हैं हम
                                                                 
                            
किसी और चाहत की दरकार ही है क्यों
चाहत और चहेते कुछ खास होते हैं
चहेतों की चाहिए भरमार ही फिर क्यों

चाहत भटकती है तो चाह भटक जाती है
आगे चल नहीं पाती है तब अटक जाती है
चाहता अटक जाए ऐसी गुस्ताखी क्यों हो
खुद ही पर कटा ले ऐसा पाखी क्यों हो

चाहत और चाह का सम्मान चलने दो
लोगों की निगाहों में तो मान चलने दो
चाहत क्या रहेगी अगर मान न रहा
क्या रहा अगर स्वाभिमान न रहा

चाहत वही है जहाँ स्वाभिमान बचा है
जिंदगी बची है अगर मान बचा है
मान ही नहीं तो जान का क्या मोल
बचा मान चाहत को बना अनमोल
-संदीप सिंह कुँवर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
20 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर