वो चाहते हैं हमको जिन्हें चाहते हैं हम
किसी और चाहत की दरकार ही है क्यों
चाहत और चहेते कुछ खास होते हैं
चहेतों की चाहिए भरमार ही फिर क्यों
चाहत भटकती है तो चाह भटक जाती है
आगे चल नहीं पाती है तब अटक जाती है
चाहता अटक जाए ऐसी गुस्ताखी क्यों हो
खुद ही पर कटा ले ऐसा पाखी क्यों हो
चाहत और चाह का सम्मान चलने दो
लोगों की निगाहों में तो मान चलने दो
चाहत क्या रहेगी अगर मान न रहा
क्या रहा अगर स्वाभिमान न रहा
चाहत वही है जहाँ स्वाभिमान बचा है
जिंदगी बची है अगर मान बचा है
मान ही नहीं तो जान का क्या मोल
बचा मान चाहत को बना अनमोल
-संदीप सिंह कुँवर
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