उसकी बनाई नियामत है पर
आज बदला बदला सा हैं आदमी ।
सिफत का खजाना हैं
क्यूं सिफलगी दिखाता हैं आदमी ।
सूरत-ए-हाल सुधरा नहीं
मुस्तकबिल की सोचता है आदमी ।
एक दूजे का बना दुश्मन, जंगल नहीं
समाज मेें रहता है आदमी ।
खुद तो चटोरा है पर
दूसरे की रोटी पर लात है आदमी ।
सत्य असत्य की सहिजानी नहीं
न्याय का ढोंग है आदमी ।
शाइस्ता, शकर जबान है फिर
सगर से भरी बात है आदमी ।
अपनों से घिरा है लेकिन
परायों के सहारे चलता है आदमी।
ता उम्र संचता, फिर भी
रहा हरदम सवाली है आदमी ।
खुद परेशानी का सबब बन
“पर“ सबील ढूंढता है आदमी।
जग जीतने का दम भरा लेकिन
खुद से हरदम हारा है आदमी ।
“और ” की चाह में खोकर सब
शाकिर बन बैठा है आदमी ।
पूरी जिन्दगी लग गई इसे पर
"मुहासिल" इसका शून्य हैं आदमी ।
संदीप कुमार मिश्रा
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