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तू कहाँ मैं अब कहाँँ।

                
                                                         
                            जी तो रहा हूं ज़िंदगी पर ज़िंदगी अब कहाँ।।
                                                                 
                            
कितना अरसा हो गया तू कहाँ मैं अब कहाँँ।।
कितने दिन गुज़र गए हमें यहाँ रूबरू हुए,,
ख़्वाबों का खस्ताहाल है आराम अब कहाँ।।
उम्मीद आख़िरी है और शम्मा भी आख़िरी,,
क्या जाने कब बुझेगी ये किसको अब पता।।
रंगीनियों का शहर कब का पीछे छूट गया है,,
वो रंग ए हाल महफ़िलें दिखती है अब कहाँ।।
तुझको तो ये भी याद नहीं होगा ए ज़िंदगी,,
महकी हुई फिज़ा थी जो रहती हैं अब कहाँ।।
कई ज़ख्म है जिनमें से इक तेरा दिया हुआ,,
रातों को जगाता हूँ नींद बिस्तर पे अब कहाँ।।
ईनाम मोहब्बत का यही मिलता है यहाँ देव,,
आंखों में जलन दिल में चुभन मर्ग अब यहाँ।।
-सुनील देव
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4 घंटे पहले

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