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सफ़र में ज़िंदगी।

                
                                                         
                            मैं अकेला ही चला था जिस सफ़र में ज़िंदगी।।
                                                                 
                            
क़ाफ़िला बढ़ता गया गर्द ए सफ़र में ज़िंदगी।।
ख़्वाहिशों के फूल तो कब के मेरे मुरझा गए,,
आँख में दरिया रहा लबालब सफ़र में ज़िंदगी।।
बारिशों का दौर भी बस छत पे ही आता रहा,,
रह गई प्यासी ज़मीं और राहगुज़र में ज़िंदगी।।
इक तेरी आवाज़ पर ही जी रहा हूं आज तक,,
गिन रहा हूं धड़कनों को बस सफ़र में ज़िंदगी।।
यूँ तो मुझको भी अभी तक याद है तेरी गली,,
सब्ज़ा उग आए हैं हरसूं और दहर में ज़िंदगी।।
तेरी फ़ितरत थी के मैं तूझसे दूर रहूं पास भी,,
ले मिला ले हाथ तू भी इस सफ़र में ज़िंदगी।।
अब किसी से क्या गिला टूट जाने के बाद देव,,
ना रही कोई आरज़ू ना अब सफ़र में ज़िंदगी।।
-सुनील देव
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एक घंटा पहले

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