हज़ारों सूरतों में अपनी जब भी सूरत तलाशी है।।
नज़र इतना सा आया के रूह अब भी प्यासी है।।
कहाँ कोई साथ देता है इस बवंडर के समंदर में,,
नाव कितनी बड़ी लेकिन नज़र आयी जरा सी है।।
वज़न पलकों का मेरी इस कदर कदमों पे भारी है,
उठाऊं पाँव तो लगता हैं के हर दिल में उदासी है।।
बुलाता हूं तो लगता हैं के कफ़स में क़ैद हर कोई,,
सुबह से शाम तक यहाँ बस हर रुख पे उदासी है।।
गुज़ारे यूँ तो सबके जैसे तैसे यहाँ पर हो ही जायेंगे
मगर मेमार की तनख़ाह भी ये बड़ी बे हया सी है।।
तपिश दिन भर अकसर आँख से ऐसे झलकती हैं,
के जैसे चाँद के हिस्से से बस दुनियाँ ख़फ़ा सी है।।
बता क्या सोचकर कर दूँ जुदा मैं साँस तन से देव,
मेरे हिस्से तो क़िस्मत से तू बस आयी जरा सी है।।
-सुनील देव
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