कोई तन्हा मुसाफ़िर राह का पत्थर ना हो जाए।।
किसी की याद ही बस मेरा मुक़द्दर ना हो जाए।।
गुजारा आंखों का यूँ तो अश्कों से हो ही जाना है,,
मगर डर ये हैं के कहीं दरिया समंदर ना हो जाए।।
सुना है याद आती हैं तो शब ए ग़म साथ लाती हैं,,
कहीं तू आवारा गलियों का सिकंदर ना हो जाए।।
सिवा यादों के तेरी पास में कुछ भी नहीं लेकिन,,
डर लगता हैं के तुझे सोचते उम्र सत्तर ना हो जाए।।
कोई तो आईना हो जो दिखा दे दिल की तस्वीरें,,
यूँ चेहरे पढ़ते पढ़ते आँख ही नश्तर ना हो जाए।।
समेटों बिखरे हर्फ़ों को कोई ख़त ही लिख दो अब
ख़बर ग़ैरों से मिलके ही कहीं बेख़बर ना हो जाए।।
चलो अच्छा हुआ के जल गया दिल रह गया तू देव,,
सभी है दौड़ में शामिल के कोई कमतर ना हो जाए।
-सुनील देव
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