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कई दिनों से देख रहा हूं ख़्वाबों में कुछ खलल सा है।।

                
                                                         
                            कई दिनों से देख रहा हूं ख़्वाबों में कुछ खलल सा है।।
                                                                 
                            
साँसें तो बेहतर है लेकिन दिल में ही कुछ शलल सा है।।
अबके बरस में हो ना हो ये साँस रुके और दम निकले,,
मुट्ठी भर की जां है लेकिन चेहरे पे कुछ ज़लल सा है।।
किसको देखें अब आईने में जब आंखों में ही नूर नहीं,,
कभी लगे सब साथ है अपने कभी लगे कुछ जल सा है।।
कोशिश तो करता हूं लेकिन हाथ आए ना कुछ अपने,,
दिल में रहती घुटन घुटन सी माथे पे कुछ बल सा है।।
दस्तक सी आती रहती हैं बस शब भर दरवाज़े से अब,,
पलकों पे हैं नींद का कब्ज़ा ज़हन में कुछ अचल सा है।।
जिसको देखों हर चेहरे पे अज़ीब सी रौनक रहती हैं,,
बाहर से सब ठीक लगे पर अंदर से कुछ छल सा है।।
मरने को तो मर जाते हम पर यही सोचते रह गए देव,,
पीने को तो विष पी लेते पर हाथों में कुछ हल सा है।।
-सुनील देव
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56 मिनट पहले

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