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कितने पीछे छूट गए सब गाँव गली वो कच्चे द्वार।।

                
                                                         
                            कितने पीछे छूट गए सब गाँव गली वो कच्चे द्वार।।
                                                                 
                            
रहते हैं आज चकाचौंध में फिर भी मरते बारम्बार।।

किसको अब समझाएंगे के क्या गुज़रा है राहों में,,
पाँव में छाले पड़ गए लेकिन मिले ना बिछड़े यार।।

हाल आज अपना ऐसा है के सुन लोगे तो रो दोगे,,
शोले ही बरसे अंबर से कभी ना बरसी कोई फुहार।।

माँ के हाथ की रोटी की वो खुशबू जाने कहाँ गई,,
याद रही तो बात बात पर बाबूजी की बस फटकार।

जाना तो चाहता हूं लौटकर लेकिन रस्ता याद नहीं,,
ना मेले लगते बच्चों के ना सजते पहले से बाज़ार।।

पक्की राहों पर दूर दूर तक कोई भी तो पेड़ नहीं,,
कैसे कोई सफ़र करे अब बदन जले हैं सौ सौ बार।।

अपने हिस्से दर्द सही पर कुछ तो अच्छा होता देव,,
पैसे पाई के चक्कर में बस गवां दिया हंसता संसार।
-सुनील देव
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5 घंटे पहले

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