गुज़र गया था तो भुलाने का जतन करना था।।
तुम्हें भी अपने लिए रोने का जतन करना था।।
ये कहां की रीत हैं मुर्दे को लिए फिर रहा है तू,,
निकल गई जां तो जलाने का जतन करना था।।
आज मेरे हाल पे क्या रह रह के रो रहे हो तुम,,
जब मैं जिंदा था मुस्कराने का मन करना था।।
आंखों में ख़्वाब पाल के क्या हांसिल कर लिया,,
वक़्त रहते ही उन्हें मिटाने का जतन करना था।।
रोशनी को जलाता रहा उम्रभर उम्मीद ए चराग़,,
खुली थी आँख तो बुझाने का जतन करना था।।
कर दिया आग के हवाले जीते जी ख़ुद को ही,,
ग़म जो भी मिले थे बचाने का जतन करना था।।
तेरी बातों से नहीं लगता हैं के तू मेरा होगा देव,,
कुछ ना सही मगर सुनाने का जतन करना था।।
-सुनील देव
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