किस किसको गले लगाऊँ मैं हर हाथ में खप्पर देखा है।।
जब जिसने चाहा तब तब ही हर हाथ ने पत्थर फेंका है।।
बदन हैं ज़ख्मों का मेला किस किसको दुलार करूंगा मैं,,
मरहम क्या असर करे इन पर हर घर पे छप्पर देखा है।।
चेहरे पर मुस्कान सजी हैं दिल के भीतर मचा घमासान,,
सफ़र तो सांसों का जारी है पर हर सर पे गट्ठर देखा है।।
दावेदारी हर इक शय पर लेकिन घर में चलती एक नहीं,,
बाजारों में तो रौनक है पर हर हाथ में चिल्लर देखा है।।
फूस के कच्चे घर देखो यहाँ इनको क्या मौसम समझेंगे,,
हर ओर बयांबां जंगल है और हर हाथ में छत्तर देखा है।।
हर शख़्स है डर के साए में कब साँस रुके ये दम निकले,,
मंज़िल तो कब की भूल गए हर पाँव में गज्जर देखा है।।
यां क्या कोई बुरा करेगा देव हर जान फंसी है उलझन में,,
हर सर पे मौत का तांडव है हर आँख में मंज़र देखा है।।
-सुनील देव
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