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कुछ रह गया तो यही रह गया के मेरा हाथ मेरे हाथ में।।

                
                                                         
                            कोई आँख में कोई हाथ में कोई दुखती रग के साथ में।।
                                                                 
                            
कुछ इस तरह से गुजर गया बस वक़्त मेरा तेरे साथ में।।

कभी रात के इक पहर में गुज़र गई यूँही अपनी ज़िंदगी,
कभी सर्दी समझ गुज़ार दी उम्र सारी ग़म ए लिहाफ़ में।।

गुनाह मुझसे कैसे हो गया दिल कैसे अपना जुदा हुआ,,
मिले गुमनाम से सब रास्ते नज़र जब गई किसी रात में।।

आ जाएगा सुकून भी थोड़ा सब्र रख कुछ तो यक़ीन कर,,
मिला कुछ नहीं सिवा अश्क़ के मुझे तो किसी शराब में।।

निशाँ अपनी सब वफ़ाओ के बारिश से साथ ही धुल गए,,
ना अब काम के ना काज के बस रह गए है हबाब के।।

गुमाँ जाने ये कैसे हो गया के यां सब के सब मेरे साथ हैं,,
गर जरूरतें कुछ पड़ गई तो बस रह गया ग़म साथ में।।

ना जब कोई था साथ में ना अब कोई अपने साथ देव,,
कुछ रह गया तो यही रह गया के मेरा हाथ मेरे हाथ में।।
-सुनील देव
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3 घंटे पहले

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