आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

छोड़ आए हैं।

                
                                                         
                            तक़दीर में लिखा था सब छोड़ आए हैं।।
                                                                 
                            
हम अपने बुजुर्गो का गाँव छोड़ आए हैं।।

क्या जानते थे आयेगा मौसम भी दर्द का,,
मटके सब मिट्टियों से बने तोड़ आए हैं।।

अच्छे की आरज़ू में जला दिए बुरे सभी,,
हमको क्या पता था के घर तोड़ आए हैं।।

नाराज़गी के नाम पर बस रह गई तन्हाई,,
महफ़िल तो कब की पीछे छोड़ आए हैं।।

रह रहके याद आए हैं बचपन की आदतें,,
सिक्कों में चंद अपना हुनर छोड़ आए हैं।।

तबियत ख़राब हो गई खा खाके शहर का,,
सरसों का साग रोटी जब से छोड़ आए हैं।।

अब कैसे जाए लौट कर वापस वहीं पे देव,,
मटकी के नाम पर दिलों को तोड़ आए हैं।।
-सुनील देव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
13 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर