जा रहा था बाप जिस दिन चार कांधों पर मेरा।।
याद आया बचपना तब और हंसीं का घर मेरा।।
हर कदम पर रो रहा था आसमाँ भी साथ साथ,,
क्या कहूं कैसे कहूं के उजड़ गया था घर मेरा।।
आँख में दरिया लिए मैं चल रहा था साथ साथ,,
धीरे धीरे भर रहा था इक ग़म का समंदर मेरा।।
छोटी छोटी ख़्वाहिशें भी मुँह फुलाकर मांगना,,
खाली होती जेब फिर भी बना गए मुक़द्दर मेरा।।
आज जब भी देखता हूं मैं दूर साहिल पर कहीं,,
आँख भर आए हैं मेरी कहां गया वो शज़र मेरा।।
अब तलक वो हादसा मेरे साथ है मेरी आँख में,,
जो कभी गुजरा था मुझ पर कहर बन कर तेरा।।
यूँ तो सब कुछ है मगर उनकी कमी तो होगी देव,,
सर पे साया ना कोई अब रह गया बस डर मेरा।।
-सुनील देव
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