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पुरानी यादों के बिस्तर से अभी तक उठ नहीं पाया

                
                                                         
                            पुरानी यादों के बिस्तर से अभी तक उठ नहीं पाया
                                                                 
                            
मैं कोशिश रोज़ करता हूं मगर रोज़ हार जाता हूं,,
ज़हन में लाख बातें है अभी तक कह नहीं पाया।।
मुझे मंज़ूर है वो जो भी मुझे सज़ा दे दे उल्फ़त में,
मगर दिल से बग़ावत मैं अभी तक कर नहीं पाया।
किसी के फ़ैसले से क्या मैं लड़ता ज़िन्दगानी भर,,
हुई इतनी उम्र दिल की अभी तक कह नहीं पाया।
समंदर आज तक मुझसे यही इक सवाल करता है,
के आख़िर क्या हुआ जो अभी तक मर नहीं पाया
ख़्वाब तो लाख आते है किसी की चाह में शबभर,,
मगर अफ़सोस उससे मैं अभी तक मिल नहीं पाया
ज़माना देखता है सोचता है क्या कहता होगा देव,,
चला हूँ जाने कब से मै अभी तक चल नहीं पाया।
-सुनील देव
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23 घंटे पहले

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