क्या किया सीज़फ़ायर ?
कब तक सीजफायर करोगे ?
कितनी बार सीजफायर करोगे?
किसके लिए सीजफायर करोगे?
धर्मियों पर कलंक के लिए?
अधर्मियों के आतंक के लिए?
कब तक सहिष्णुता की भूमि को ही परीक्षा देनी होगी?
क्यों न्याय की वेदी पर अग्नि सेतु ही लेनी होगी?
क्या 'अहिंसा परमो धर्मः' का अर्थ आत्मविस्मृति है?
क्या 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' में दुष्टों की स्वतंत्रता भी समाहित है?
क्या 'धर्म रक्षा' अब केवल ग्रंथों तक सीमित रह गई?
क्या इतिहास के सबक अब केवल प्रतियोगी परीक्षा की कीमत हैं?
क्या 'विश्वशांति' का अर्थ यही है
कि एक राष्ट्र लहू बहाता रहे
और दूसरा मर्यादित होकर
'शांति' का झंडा थामे संसद से
संयुक्त राष्ट्र की सीढ़ियाँ गिनता रहे?
गुरु गोविंद से सीखें हम
"चिड़ियों से मैं बाज लड़ाऊं,
गीदड़ों को मैं शेर बनाऊ !
सवा लाख से एक लड़ाऊं
तभी गोबिंद सिंह नाम कहाऊं!
गुरु का भी केवल
युद्ध नहीं था;
वह धर्म की चोटी और दृढ़ता थी
जो औरंगजेब की सल्तनत से
कटकर भी नतमस्तक होना न सीखी
मां भारती की शक्ति को समझो जो
चकमक जैसे पत्थर से भी
अग्नि खींच पूरी लंका जला दे!
नेहरू ने शांति हेतु पंचशील दिया
पर शांति मूल्यवान तब तक है
जब तक सीमा पर 'गोलियाँ'
शब्द-अर्थ को निगल न जाएँ।
अटल साहब की अटल थी महिमा
लाहौर में फर्राटा बस दौड़ा दी!
पर करगिल की चोटी पर गाड़ तिरंगा
पूरी दुनिया को समझाया;
जैसे को तैसा कहने की
हिम्मत सीने में रखते हैं!
पास हमारे चाणक्य की विरासत
कूटनीति से कदम बढ़ाओ
समझौता हो या कोई सन्धि वार्ता
विनयशीलता तब तक श्रेष्ठ है
जब तक नजरें दुर्बल न आंके
पर जब विदेशी नीतियां
निर्णयों पर पांव पसारे तो
वह विनम्रता केवल आत्मघात है!
आये दिन सीज़फ़ायर के नाम पर
गोरों की कूटनीतिक मध्यस्थता
संप्रभुता का चीरहरण है!
संविधान से पूछो वह कहता है
"हम भारत के लोग..."
"संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न …लोकतंत्रात्मक गणराज्य…"
तो फिर कौन है ऐसा शहंशाह
जो बागडोर हमारे निर्णयों की थामे?
संप्रभुता यदि हस्ताक्षर से
गिरवी रखी जा सकती है
तो फिर स्वतंत्रता दिवस हमारा
मान लो केवल इक कोरा उत्सव है
आजादी के भीतर गुलामी या बंदन है
हमें चीखकर कहना होगा
यहां रामायण की मर्यादा तो
महाभारत का रण भी है
यहां गाँधी की शांति है तो
सुभाष की क्रांति भी है
युद्ध हमारा केवल सीमा की बात नहीं
भले मान लो 'पंथ' और 'प्राण' का
निर्णायक प्रश्न सही
प्रश्न मां भारती के लिए यही
जो अशोक, अर्जुन हो या पोरस
समझा गये हैं विजयगान गाकर
तुम भूल गए हल्दीघाटी?
जहाँ महाराणा ने ठाना था
स्वाभिमान के आगे
मृत्यु भी इस माटी में वंदनीय है।
फिर क्यों किसी गैर की सुनते हम हैं
मुठ्ठी बांध हमें आज सौगंध लेनी होगी
कि अबके दिल्ली से लाहौर तक
नवग्रहों की धूप-दीप जलानी होगी
और धर्म पर हुए नरसंहार
की हर पीड़ा
तिरंगा में तिरोहित करनी होगी।
जब तक आतंकिस्तान झुके नहीं,
जब तक हर फैसला
दिल्ली की शर्तों पर लिखा न जाए
सोचो तब तक रण केवल विमाओं से नहीं है
सोचो तब तक रण केवल सीमाओं से नहीं है
अरे! जब 370 हटा दी तुमने,
क्या POK पर अटक गए?
बढ़ो, तुम्हारी शक्ति प्रबल है
सेना तुम्हारी बड़ी सबल है
यही समय है सही समय है
तब तक केवल युद्ध करो
योद्धाओं का धर्म युद्ध है
युद्ध करो और युद्ध विजय करो
लगे रहो! जगे रहो! डटे रहो!
-सम्भावना पन्त
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