तुम इस सुधरे समाज की बिगड़ी लड़की बनना,
जो समाज की बेतुकी रस्मों पर सवाल कर सके,
तुम ऐसी लड़की बनना।
तुम इस सुधरे समाज की बिगड़ी लड़की बनना|
जो बस रसोई तक सीमित न रहे,
जो खोल सके दरवाज़ा अपने सपनों का।
तुम ऐसी लड़की बनना।
तुम इस सुधरे समाज की बिगड़ी लड़की बनना।
जब वो कहें कि उन्होंने तुम्हें जीने की आज़ादी दी,
तो तुम्हारी आज़ादी का हक़ उन्हें किसने दिया?
ये सवाल पूछ सको,
तुम ऐसी लड़की बनना।
तुम इस सुधरे समाज की बिगड़ी लड़की बनना।
बाँध ज़ंजीरें वो देंगे तुम्हें, आँगन, उड़ने को।
तुम तुमसे छुपाया वो खुला आसमान चुनना।
उड़ जाना, ले ज़ंजीरें साथ में,
फिर न किसी को उनमें बंधने देना।
तुम इस सुधरे समाज की बिगड़ी लड़की बनना।
तोड़ के सारे बंधन, तुम अपनी खुशियों को चुनना।
आएँ आवाज़ें कितनी भी, तुम बस पीछे न मुड़ना।
लड़ जाना, भिड़ जाना, बस रुकना मत।
खुद को फिर से आँगन में बंद करना मत।
तुम ऐसी लड़की बनना।
तुम इस सुधरे समाज की बिगड़ी लड़की बनना।
बात आए जब आत्मसम्मान पर तुम्हारे,
तो सब छोड़ तुम बस खुद को चुनना।
और मिले जो कोई अनजान परिंदा आसमान में,
तुम उसे इस सुधरे समाज में बिगड़ा बनने को कहना।
तुम ऐसी लड़की बनना।
तुम इस सुधरे समाज की बिगड़ी लड़की बनना।
— साक्षी साहू
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