खेंच के सर से ग़म की चादर लौट गया
शेर सुनाये और सुख़नवर लौट गया
गुलदस्तों में कितनी ताक़त होती है
खामोशी से सारा लश्कर लौट गया
शहर की रौनक़, बादल ,बारिश क्या देखूँ
वो क्या बदला, मंज़र-मंज़र लौट गया
अपने घर के शीशे मुझको याद आये
इन हाथों में आकर पत्थर लौट गया
जैसे चाहो अब तुम वैसे बन जाओ
चाक पे धर के इक कूज़ागर लौट गया
-साजिद सफ़दर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X