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ख़ून लिखते हैं

                
                                                         
                            गिरे हुए सिक्के उठाया नहीं करते
                                                                 
                            
हाँथ गैरों से मिलाया नहीं करते।
ठहर जाते हैं वहीं खुला आसमान हो जहाँ
घर अमीरों के शहर बसाया नहीं करते।

वो चाहें तो सरकारी फतवा लगा दें
ऐसी धमकियों से घबराया नहीं करते।
शायर हैं हम सिर्फ शायरी ही कहेंगे
मियां नफरत का पाठ पढ़ाया नहीं करते।

जेब में छुरी नहीं हम क़लम रखते हैं
खून लिखते हैं बहाया नहीं करते।

-साहिल मिश्रा 

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7 वर्ष पहले

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