आज बेटे के दाख़िले ने ये एहसास दिलाया,
इक दौर था अपना भी, जो लौटकर न आया।
वो बस्ता, वो किताबें, वो स्कूल की इमारत,
हर ज़र्रा मुझे बचपन की यादों में ले आया।
अपने ही बचपन की झलक बच्चे में देखी,
दिल यादों के समंदर में डूबता चला आया।
वो बचपन की शोख़ियाँ, वो बेफ़िक्र-सी हँसी,
हर भूला हुआ मंज़र आँखों में समाया।
जिस राह पे उँगली पकड़कर कभी चले थे,
उसी राह पे बच्चे को लेकर क़दम बढ़ाया।
कल तक जो हमारी ही उँगली थामे चलता,
आज उसको नई राह पे चलते हुए पाया।
हम सोचते थे वक़्त गुज़रता है धीरे-धीरे,
बच्चे को बड़ा होते देखा, तो होश आया।
जिस उम्र में हम ख़ुद भी खिलौनों से खेले थे,
उस उम्र में बच्चे को किताबों से मिलाया।
कुछ यादें थीं जो वक़्त की तह में छुपी हुई थीं,
बेटे के बहाने हर इक मंज़र नज़र आया।
वो दिन भी थे कि हमको बड़ा होने की जल्दी थी,
अब वक़्त ने पलटकर वही बचपन दिखाया।
शायान के बहाने ये जाना है हमने,
बचपन तो चला जाता है, फिर लौटकर न आया।
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