राज दिल का बताना नहीं चाहिए,
हर किसी को जताना नहीं चाहिए।
आंधियों ने बग़ावत की ठानी यहाँ,
अब दिया यूँ जलाना नहीं चाहिए।
दुनिया वाले तमाशा बना देंगे फिर,
भीड़ में दिल लगाना नहीं चाहिए।
मैंने रोते हुए को हँसा तो दिया,
अश्क आँखों में लाना नहीं चाहिए।
मुफ़्त में ही लुटा दी वफ़ा हमने भी,
मोल इतना गिराना नहीं चाहिए।
दोस्ती के मुखौटे बहुत हैं यहाँ,
हाथ यूँ ही मिलाना नहीं चाहिए।
बात बिगड़ेगी जब भी ज़ुबां खोलेंगे,
हर जगह लब हिलाना नहीं चाहिए।
ज़ख़्म अपनों ने ही जब दिए हैं यहाँ,
ग़ैर पर हक़ जमाना नहीं चाहिए।
जिस जगह कद्र एहसासों की ही न हो,
उस गली लौट जाना नहीं चाहिए।
आईनों से शिकायत करें किसलिए,
खुद से नज़रें चुराना नहीं चाहिए।
एक बस्ती ही काफ़ी है जीने को अब,
शहर सारा बसाना नहीं चाहिए।
राज दिल का बताना नहीं चाहिए,
हर किसी को जताना नहीं चाहिए।
-सचिन पाण्डेय
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