हर शौख पे पहरे लगे
हर तमन्ना मिटाई गई
दिल मे जगी जो लौ कभी
तो दिल मे ही बुझाई गई ,
हम करते रहे इन्तजार
इन्तजार सिर्फ इन्तजार
और इन्तजार की घड़िया बढाई गई,
हर शौख पे पहरे लगे
हर तमन्ना मिटाई गई,
जो कमी थी ही नही
वो कमी बताई गई
हर सीखी हुई अदा
फिर से सिखाई गई,
हम जलते रहे बुझते रहे
बुझ बुझ के जलते रहे
फिर चन्द शोलो से
ख्वाहिशो की बस्तियां जलाई गई,
हर शौख पे पहरे लगे
हर तमन्ना मिटाई गई,
लड़ते रहे निहत्थे
जंग ऐ बाजार मे
कटते रहे मिटते रहे
तलवार की धार पे,
होता रहा इम्तिहान
और हम फेल होते गए
जो खत्म ना हो सका
वो खेल होते गए,
खेल खेल मे अपनी
दुनिया ढहाई गई
हर शौख पे पहरे लगे
हर तमन्ना मिटाई गई,
हर तरह से दिल को
समझाना ही पड़ा
खुद को खुदी की नजरो मे
गिराना ही पड़ा,
लगे रहे शिद्दत से
फिर भी हम डूबे
खडे हो के आईने मे
अपने को हम ढूढे,
हर समस्या के आगे
अपनी समस्या भुलाई गई
हर शौख पे पहरे लगे
हर तमन्ना मिटाई गई
दिल मे जगी जो लौ कभी
तो दिल मे ही बुझाई गई,
- सचिन निगम
बाराबंकी
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