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"दुखों का कारण"

                
                                                         
                            छोड़ो इंसानों कल की बात,
                                                                 
                            
नए दौर में निभाओ एक दूसरे का साथ।
सुनाता हूं दुखों का कारण,
जिसके वजह से होगा दुखों का निवारण।
दुख तो अपना हम सफर है।
सुख तो जिंदगी का एक कहर है,
सुख और दुख आता जाता रहता है,
जैसे कि हर पल मौसम बदलता रहता है।
वर्तमान की चिंता छोड़, भविष्य में डूब जाते हों
जैसे कि पतझड़ ऋतु में पत्ते सूख जाते हों ।
वर्तमान में लोग जीना नहीं चाहते,
और बीते हुए समय को याद कर पछताते।
कौन इन्हें समझाएगा? जिंदगी स्वर्ग बन जाएगा,
एक बार जब तुम वर्तमान में जी पाएगा।
लालच छोड़ खुद पर भरोसा करना सीख ले,
एक बार तू अपनी मेहनत का स्वाद चीख ले।
फिर तू देख तेरी जिंदगी बदल जाएगी
खुश होने से तुझे दुनिया नहीं रोक पाएगी।
द्वेष करना छोड़ दे,सुख अपने आप मिल जाएगा,
तेरी जिंदगी में भी वो गूल खिल जाएगा।
कर नहीं तू अपनी जीवन में किसी की निंदाई,
दुखों से दूर रहेगा इसी में है तेरी भलाई।........ 
-रुपेश परदेशी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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