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किसी ज़ालिम की जन्नत यूँ सरेआम बाजार बैठी है।.

                
                                                         
                            लूटा कर उम्र की सारी दौलत वो खाली हाथ बैठी है,
                                                                 
                            
किसी ज़ालिम की जन्नत यूँ सरेआम बाजार बैठी है।

सारी उम्र की खुशियां लुटा देती हैं,
औलाद की एक मुस्कान पे
इसका सिला ये मिलता है एक बूढी मां के।
उस मां का कसूर क्या था ?
उसके लिए ही माँ का वो जहां था।
दरबदर ठोकरें खाकर प्यास से तड़पती बैठी हैं।
लूटा कर उम्र की सारी दौलत तो खाली हाथ बैठी है,
किसी ज़ालिम की जन्नत यूँ सरे आम बाजार बैठी है।

उस मां को देखकर वो रात याद आती है,
ठंड की रात जब अपने आंचल में छिपाती है।
मैली सी चिथड़ी सी आंचल में लिपटी हुई,
वो दर्द याद कर कर के बिलखती हुई।
किसी सड़क के किनारे बैठी है सीमटी हुई,
वह खुद चुप हो जाती है सीसकती हुई।
हड्डियों में जान नहीं, फिर भी हिम्मत बांध,
एक डंडे के सहारे चलती है झुकती हुई।
सहारा देगा आंखें बिछाए इंतजार बैठी है,
लूटा कर उम्र की सारी दौलत तो खाली हाथ बैठी है,
किसी ज़ालिम की जन्नत यूँ सरेआम बाजार बैठी है।.

 
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एक घंटा पहले

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