काम पर जाती औरतें
रात के अंधेरे में ही जागती हैं,
सपनों को तकिए के नीचे दबाकर,
अपनी हसरतों को चाय में घोलकर,
मुस्कान की चादर ओढ़ निकलती हैं।
पर क्यों जाती हैं ये हर रोज़?
कभी पेट की आग बुझाने,
कभी अपने बच्चों को पढ़ाने,
कभी अपने सपनों को पूरा करने ,
तो कभी सिर्फ़ अपने वजूद को बचाने।
हाथों की चूड़ियाँ खामोश हो जाती हैं,
जब मशीनों की आवाज़ में दब जाती हैं,
आँचल सिमट कर कमर में बंध जाता है,
जब कुर्सियों की कतारों में बैठती हैं।
कभी कपड़े सीती हैं, कभी तक़दीर,
कभी खेतों में बोती हैं अपनी तकलीफ़,
कभी बर्तनों में माँजती हैं सपने,
कभी स्कूल में सिखाती हैं तमीज़।
भीड़ में अकेली, पर भीड़ का हिस्सा,
हर दिन चलती हैं इक नई दिशा,
बच्चों की हँसी के लिए खुद रोती हैं,
बस हर चोट को चुपचाप संजोती हैं।
थकती भी हैं, रुकती भी हैं,
कभी सब्र का घूँट पीती हैं,
तो कभी अपने ही आँसुओं को पी जाती हैं।
पर हारती नहीं, बस चलती रहती हैं,
क्योंकि वो जानती हैं—
अगर वो रुक गईं,
तो घर की नींव हिल जाएगी।
ये सिर्फ़ काम पर नहीं जातीं,
ये घर-परिवार की उम्मीदें उठाती हैं,
रिश्तों की डोर को मज़बूत बनाती हैं,
अपने हर दर्द को रौशनी में ढालकर,
हर दिन ज़िंदगी को फिर से गढ़ती हैं।
ये काम पर जाती औरतें
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