निशिता काल के नूर में,
जब कान्हा मुस्कुराए थे।
दिल की सूनी गलियाँ,
झूम उठी थी मुरली के संग।
प्रेम रस के गीत संग,
यमुना की लहरे मचल रही थी।
गगन में ठहर कर चाँद,
सितारों संग नहाया था।
जहाँ थी उदासी कल,
वहाँ अब राग बजने लगे थे।
कान्हा के हाथ में मुरली,
राधे राधे जप रही थी।
आज कान्हा से बस,
इतनी दुआ है मेरी।
मेरे दिल के हर चैंबर में,
बस कान्हा ही कान्हा रहे।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X