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तेरी याद मिटाने को मैं कितना खुदको आग लगाऊँ।

                
                                                         
                            मैं अपनी पीड़ाओं का अब कैसे तुमको राग सुनाऊँ,
                                                                 
                            
तेरी याद मिटाने को मैं कितना खुदको आग लगाऊँ।

बंजर-सा अब मेरा मन है, न इसमें कोई प्यार रहा,
आग लगी है खुशियों में, ना खुशियों का संसार रहा।
तेरे जाने का ग़म है बस, और तो कोई बात नहीं है,
न तुम हो, न ख़्वाब तुम्हारे, और हँसी वो रात नहीं है।

कल मैंने जो गीत लिखे थे, वो कैसे तुमको आज सुनाऊँ,
तेरी याद मिटाने को मैं कितना खुदको आग लगाऊँ।

मैं तेरा हूँ, तू मेरी है, इसमें तो शायद कोई द्वंद नहीं था,
मेरा मुझको मालूम है, पर तेरा दिल स्वच्छंद नहीं था।
जाओ, लौट के मत आना, तेरा तुझको संसार मिला है,
तेरी खुशियों के खातिर, ग़म का मुझको उपहार मिला है।

गीत ग़मों के लिखता हूँ, और ग़म के सबको राग सुनाऊँ,
तेरी याद मिटाने को मैं कितना खुदको आग लगाऊँ
- रोहित तिवारी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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