कंधे में हाथ डालकर लिपटे हुए वो लोग।
हैं साँप ही पर साँप से दिखते नहीं वो लोग।
जहर भी उगलते हैं और डँसते भी हैं यार,
घाव भी देते हैं,अपने से लगते हुए वो लोग।
अगर ग़ौर से कभी जो देखोगे तुम उन्हें,
आँखों से आँख चुराकर मिलते हैं वो लोग।
सिजदे में शामिल वो पहले ही मिलेंगे,
पर पीठ पीछे ही रूप बदलते हैं वो लोग।
कहते हुए मिलेंगे कि जमाना ख़राब हैं,
ख़ुद गुनाहों की राह पर चलते हैं वो लोग।
ख़ैर-ओ-ख़बर में रहना उनकी भी तुम ज़रा,
बेमतलबी क़सीदा पढ़ते हैं जो लोग।
—रोहित तिवारी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X