फैशन
भारत में लेकर जन्म जहाँ, वीरों ने शान दिखाई है ।
रण कर भूमि से प्रकट हुई, वो रानी लक्ष्मीबाई है ।
सभ्यता जहाँ से जन्मी है, वो हिन्द मेरा मतवाला है ।
संस्कार जहाँ से पले- बढ़े वो भारत देश निराला है ।
फैशन ने लूटा भारत को, और इंडिया इसे बनाया है ।
फैशन ने आकर भारत में, संस्कृति का नाम डुबाया है ।
जिस देश में गायें पाली जातीं, उस घर में कुत्ते पले हुए,
माता कहकर छोड़ा जिसको, कुत्तों के खुद वो बाप हुए ।
जिस धरती पर पुरखों ने मेरे, संस्कृति की महिमा गाई है ।
उस पर फैशन ने आकर के, सभ्यता सारी गँवाई है ।
निकाल दिया घर से पुरखों को, और वृद्धाश्रम भिजवाया है
फैशन ने आकर भारत में,संस्कृति का नाम डुबाया है ।
पश्चिमी सभ्यता आई ऐसी, जिसने हिंदी का मान गिरा डाला ।
अंग्रेजों की अंग्रेजी ने, सभ्यता को ही मिटा डाला ।
फिल्मी दुनिया छाई है यहां, बच्चे बच्चे के चेहरे पर ।
फैशन की छाप दिखाई देती मुझको, घर-घर के दरवाजे पर ।
अर्द्धनग्न संगीतों ने ही, भारत की अखण्डता को मिटाया है ।
फैशन ने आकर भारत में, संस्कृति का नाम डुबाया है ।
गुरुकुल सारे स्कूल हुए, गुरु भी मेरे मजबूर हुए ।
संस्कार-सभ्यता को रख कोने, पैसे लेने में चूर हुए ।
मुर्दे का करते इलाज दिखे, डॉक्टर भी सारे भृष्ट हुए ।
खा गए जमीन चरागाहों की, अधिकारी मद में चूर हुए ।
पैसे पाकर सब लोगों ने, बस अपनी कोठी को चमकाया है ।
फैशन ने आकर भारत में, संस्कृति का नाम डुबाया है ।
आश्रम थे सारे पहले जो, वैश्या के ठिकाने बनते गए ।
साधू-सन्त बने फिरते जो, वो मैखाने तक चलते गए।
खाकी मैंने बिकती देखी, दस-दस रुपये के नोटों पर ।
राजनीति के नेता जी को, देखा दारू के ठेके पर ।
संस्कार बहाकर पानी में, सभ्यता को इन्होंने लुटवाया है ।
फैशन ने आकर भारत में, संस्कृति का नाम डुबाया है ।
पहन के छोटे कपड़ों को, चलती हैं यहाँ पर महिलाएं ।
ऊँचे-ऊँचे सैंडिल पहने, घूरे फिरती हैं बालाएँ ।
हो रही संस्कृति तार-तार, सभ्यता गयी मैखाने में ।
पायल की गूँजे झंकार, लगते ठुमके दरबारों में ।
संस्कार मिलाकर कूड़े में, बस कूड़ादान बनाया है ।
फैशन ने आकर भारत में, संस्कृति का नाम डुबाया है ।
पैरों में फटी जीन्स पहनकर, आधी बाहें दिखाती हैं ।
बिना ओढ़नी के चलतीं, और सभ्यता सभी को सिखलाती हैं ।
साड़ी पहने जब देखें अबला को, ये गँवार बतलाती हैं ।
संस्कारों की जननी कहलाने वाली, संस्कारों को ही मिटाती हैं ।
भारत में रहने वाली सीता का, इन्होंने ही सम्मान गिराया है
फैशन ने आकर भारत में, संस्कृति का नाम डुबाया है ।
आधी छाती को दिखलाकर, वे अपनी मर्यादा भूल गयीं ।
ओढ़नी हुई सिर से गायब, और अपना वादा भूल गयीं ।
चुस्त-चुस्त कपड़े पहने वो, साड़ी का मान गँवा बैठीं ।
हो गईं हैं बुढ़िया के जैसी, लेकिन बनकर वो जवाँ बैठीं ।
हिन्द की जोधाबाई का, इस फैशन ने नाम गँवाया है ।
फैशन ने आकर भारत में, संस्कृति का नाम डुबाया है ।
बात करूँ जो लड़कों की तो, लम्बे बाल रखाते हैं ।
लुटा-लुटा कर पैसे पिता के, फैशन को अपनाते हैं ।
उड़ा रहे हैं सिगरट को, और डोले फिरते हैं जमाने में ।
कहीं खा रहे चरस-भांग, तो कहीं पड़े मैखाने में ।
अपने माता-पिता गुरु को, डण्डों से पिटवाया है ।
फैशन ने आकर भारत में, संस्कृति का नाम डुबाया है ।
धुएँ में उड़ती जीवन-लीला, गलियों और चौबारों में ।
नौजवान मनाते रासलीला, चौराहे और बाजारों में ।
चोरी और लूट हैं करते ईमान-धरा की मिट्टी पर ।
नाम गँवाते हैं खुद का और मर जाते हैं धरती पर ।
फैशन के चक्कर में सबने, बस नशे को ही अपनाया है ।
फैशन ने आकर भारत में, संस्कृति का नाम डुबाया है ।
कहीं कोई अबला देखी तो, खुद बेकाबू हो बैठे ।
नशे में चकनाचूर हुए, और बनकर डाकू वो बैठे ।
कुत्तों सा नोंच दिया तन को, और मार भी उसको डाला है ।
एक अकेली अबला का, ना कोई वहाँ रखवाला है ।
उजाड़ दिया घर बेटी का, और जिन्दा उसे जलाया है ।
फैशन ने आकर भारत में, संस्कृति का नाम डुबाया है ।
रोहित शुक्ला "सहज"
*कवि एवं पत्रकार (शाहजहाँपुर)*
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