त्रय तापों को छिन्न करे जो, वह तीक्ष्ण धार त्रिशूल यहाँ,
मानव के अंतर्द्वंद्वों का करता संपूर्ण समूल यहाँ।
अहंकार की उच्च शिखा को क्षण में जो बेध गिराता है,
तमसावृत इस अंतस में वह नव प्रकाश फैलाता है।
भूत, भविष्यत और वर्तमान के बंधन को जो काट रहा,
इच्छा, कर्म और ज्ञान बीच का भेद निरंतर पाट रहा।
त्रिनेत्र की इस जागृत दृष्टि का वह अनुपम प्रतिमान है,
जहाँ तार्किकता की परिधि थमे, वह परम सत्य का गान है।
संकल्पों की प्रत्यंचा पर जब साहस बाण संधता है,
तब पाषाणी व्यवधानों को भी यह त्रिशूल बेधता है।
मूर्छित चेतना की सुप्ति को जो पल में भंग कराता है,
वही धार बन अन्तर्मन में सत्य स्वरूप दिखाता है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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