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इस वसुधा का कण-कण पुलकित मंगल गान सुनाता है

                
                                                         
                            प्रखर तेज से दीप्त भाल हो पग में गति का वास रहे
                                                                 
                            
हृदय पटल पर केवल केवल विजय-लक्ष्य की आस रहे
विघ्न-बाधाएँ कोटि-कोटि हों सम्मुख आकर आज खड़ीं
भीतर की हुंकार जगाओ टूटेगी यह दमन-कड़ी

तिमिर-जाल यह छिन्न-भिन्न हो आलोकित हो धरा सकल
सत्य-मार्ग पर बढ़ते जाना तजकर मन का मोह-सकल
शौर्य-सूर्य का उदय गगन में नव-प्रभात का दूत बने
कर्म-योग का पावन चिंतन जीवन का अनुभूत बने

अरि-दल सम्मुख नत-मस्तक हो देख तुम्हारा रूप विकट
काल-चक्र भी थमे अचानक आये जब यह क्षण अति-निकट
ध्वज गौरव का फहरे नभ में मस्तक कभी न झुकने पाये
राष्ट्र-आरती के स्वरों में यह जीवन अर्पित हो जाये

संकल्पों में वज्र-शक्ति हो वाणी में पीयूष-प्रवाह
पथरीली राहों पर भी हो पग-पग पर नूतन उत्साह
सुप्त चेतना जागृत कर अब तम का अंत सुनिश्चित कर
भाग्य-लेख को बदल स्वयं ही पौरुष का तू परिचय भर

गिरि-श्रृंगों पर विजय-केतु का फहराना ही धर्म यहाँ
कायरता का लेश न होवे केवल गूंजे कर्म यहाँ
रक्त-बिंदु जो गिरे भूमि पर वह क्रांति का बीज बने
कोटि-कंठ का महाघोष यह गगन-भेद की रीति चुने

अचल हिमालय-सा गौरव हो सागर-सा गम्भीर हृदय
विपदाओं की झंझाओं में तनिक न होवे मन विस्मय
अंतिम श्वास रहे जब तक भी तब तक केवल युद्ध रहे
सत्य-सनातन न्याय-मार्ग यह सर्वदा ही विशुद्ध रहे

युग-परिवर्तन की वेला में तुम ही महा-विधाता हो
इतिहासों के स्वर्णिम पृष्ठों के तुम ही निर्माता हो
शिथिल न होने पाये उर की अग्नि सुलगती जो भीतर
सिंधु लांघकर बढ़ते जाना बनकर तुम अजेय प्रखर

ज्ञान-खड्ग हाथों में लेकर अज्ञानता का नाश करो
संस्कृति के पावन मूल्यों का जन-जन में परकाश करो
कोटि सूर्य सम तेज तुम्हारा तप्त कंचन सा चमके
अन्यायी के गढ़ का कंगूरा भय से थर-थर दमके

पूर्वजों का पुण्य-प्रताप तुम्हारी धमनियों में बहे
स्वाभिमान का यह अनुपम धन संकट में भी अक्षुण्ण रहे
श्रम-सीकर से सींच धरा को शस्य-श्यामला रूप दो
मूर्छित पड़ी हुई सृष्टि को नव-चेतना का भूप दो

त्याग-तपस्या की ज्वाला में तपकर ही कुंदन बनना है
अनाचार के इस मरुथल को वीर ! तुम्हें नंदन करना है
मृत्यु-देव भी सम्मुख आकर थर-थर काँपे देख तुम्हें
अमरत्व की अमर कहानी लिखनी है अब आज तुम्हें

इस वसुधा का कण-कण पुलकित मंगल गान सुनाता है
दिग-दिगंत में शौर्य तुम्हारा विजय-दुदुंभी बजाता है
परम-सिद्धि की इस वेला में पूर्ण हुआ संकल्प तुम्हारा
नत-मस्तक है आज विधाता धन्य हुआ यह राष्ट्र हमारा

— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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