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अब कौन सांत्वना दे आकर

                
                                                         
                            सूनी बैठी आज किवाड़ी
                                                                 
                            
रोती घर की टूटी साड़ी
चूल्हे की आग भी ठंडी
साँसों की गति अब मंदी

आँखों का पानी सूख गया
भीतर कुछ भारी टूट गया
आँगन में सन्नाटा पसरा
दुख का यह दरिया गहरा

अब कौन यहाँ हँसकर बोलेगा
सुख-दुख की गाँठें खोलेगा
तुलसी की साख उदास खड़ी
विपदा की घड़ी यह बहुत बड़ी

रुदन कर रही बूढ़ी माई
कैसी यह कठिन घड़ी आई
सहम गया है छोटा बच्चा
रिश्ता था जो सबसे सच्चा

खेतों की मिट्टी रोती है
फसलें अब आँसू बोती हैं
बैल खड़े हैं गर्दन डाले
पड़ गए हैं हाथ में छाले

था जो इस घर का उजियारा
टूट गया वह भोर का तारा
छूट गया सब साज-सँभाला
भाग्य ने ऐसा पासा डाला

पड़ोसी आकर मौन खड़े हैं
आँसुओं के साए बड़े हैं
सांत्वना के सब शब्द अधूरे
कहाँ हुए अरमान वे पूरे

समय की लाठी भारी है
सब पर ही पड़ती बारी है
पर यह घाव बहुत गहरा है
यादों का इस पर पहरा है

अब कौन सांत्वना दे आकर
सुख की कोई बात सुनाकर
सन्नाटा ही अब गाता है
अंधियारा मन को भाता है

चले गए तुम छोड़ अकेले
जहाँ लगे थे सुख के मेले
मौन हुई यह सकल कहानी
शेष बची बस आँखों में पानी

— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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