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प्रेम और अतीत की परछाई

                
                                                         
                            प्रेम और अतीत की परछाई
                                                                 
                            

प्रेम है मन में उसके, पर अब जताना नहीं चाहती,
प्रीत निभाना जानती है, पर अब निभाना नहीं चाहती।
न जाने कैसा रहा उसका अतीत, कि फिर पहले सी बन न पाई,
कहती है अब चाह नहीं इन सबकी, सब जानकर भी कुछ कहना नहीं चाहती।

कैसे बनाऊँ मैं उसे अपना, या बस रह जाएगा यह एक सपना,
हाथ पर हाथ धरे बस स्मृतियों में खोई रहती है,
प्रेम तो करती है, पर अब जताना नहीं जानती।

कैसे देख पाऊँगा उसे भविष्य में, किसी और के साथ मंडप की वेदी पर,
साहस तो अपार है उसमें, पर अब वो साहस दिखाना नहीं चाहती।

स्वप्न देख रहा हूँ कि मंडप में उसके संग फेरे ले रहा हूँ,
सात जन्मों के वचन दे रहा हूँ, माँग में सिंदूर की रेखा खींच रहा हूँ।
मेरी निद्रा को भी जब इन स्वप्नों का भान हो गया,
तो अब यह नींद भी मेरी आँखों में आना नहीं चाहती।

साहस तो अपार है उसमें, पर अब वो साहस दिखाना नहीं चाहती।
— रोहित शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

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